जो तुम मुझे समझते तो सरे आम यूँ नुमाईश न होती।
मैं खुद तुम्हारे पिंजड़े में कैद रहती, जो तुम्हारी ज़ोर आजमाईश न होती।
अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती तुमपे, जो ऐसा करने की मुझपे तुम्हारी बंदिश न होती।
मेरी दुनिया तुमसे शुरू और तुमपे खत्म होती, जो तुम्हारी मुझसे पिछले जन्म की रंजिश न होती।
मैं तो तुम्हारे हाथों का खिलौना होती, जो ऐसी तुम्हारी फरमाईश न होती।
जो तुम न मुझसे बेवजह भागते होते, तो रिश्ता टूटने की कोई गुंजाईश न होती।
अपूर्वा तिवारी
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