माफ करो हमें हे ईश्वर,
जानते हैं यह शरीर है नश्वर।
फिर भी अपने प्रियजनों को जाते देख, है बड़ा दुःख होता,
दर्द वही समझ पा रहा है, जो है अपनों को खोता।
प्रकोप प्राकृतिक है, साथ में मानवता भी हो रही है शर्मसार,
मौत की प्रदर्शिनी से ही इन दिनों भरा है पूरा अखबार।
साँसों का भी हिसाब रखना होगा, ऐसा कभी सोचा न था,
बाज़ार बंद रहेंगे और रौनक श्मशानों में होगी, ऐसा नरक कभी भोगा न था।
हर व्यक्ति चाहता है इस वक़्त दूसरे से मानसिक सहयोग,
कौन सी दवा संजीवनी है, इसपे अभी भी चल रहा है प्रयोग।
अपने जीवनकाल में पहली दफ़ा ऐसी विडंबना देख रहे हैं,
उसमें भी कुछ भल मानुष दूसरों की चिताओं पे अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं।
कौन कब साथ छोड़ कर चला जाए, नहीं है इस बात का ठिकाना,
हे मनुष्य आपसी बैर त्याग दो, मान कर इसे एक बहाना।
यथार्थ यही है कि अकेले आये हो अकेले ही है जाना,
दौलत तुम्हारे बाद यही रह जायेगी, जिसे लूट ले जायेगा ये ज़माना
अपूर्वा तिवारी
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