Thursday, 15 April 2021

जो तुम मुझे समझते तो सरे आम यूँ नुमाईश न होती। 
मैं खुद तुम्हारे पिंजड़े में कैद रहती, जो तुम्हारी ज़ोर आजमाईश न होती। 
अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती तुमपे, जो ऐसा करने की मुझपे तुम्हारी बंदिश न होती। 
मेरी दुनिया तुमसे शुरू और तुमपे खत्म होती, जो तुम्हारी मुझसे पिछले जन्म की रंजिश न होती। 
मैं तो तुम्हारे हाथों का खिलौना होती, जो ऐसी तुम्हारी फरमाईश न होती। 
जो तुम न मुझसे बेवजह भागते होते, तो रिश्ता टूटने की कोई गुंजाईश न होती। 

अपूर्वा तिवारी

Sunday, 11 April 2021

ओ दहेज के दानव, अब तेरी आस क्या है
सब कुछ तो सौंप चुकी तुझे अपना, अब बचा मेरे पास क्या है
तू मात्र इक पुरुष है, इसके अलावा तेरी बिसात क्या है। 

मेरे तन मन का तुझे कोई मोल नहीं, उन्हें तू अपने अधिकारों की आड़ में मटिया मेट कर चुका है, 
मेरे धन के लिए इतना पागल है तू, क्या वाकई तेरे अंदर का इंसान मर चुका है। 

दूसरे को बर्बाद करने से पहले ज़रा अपनी बहन बेटियों के बारे में भी इक पल सोच, 
तुम जैसों से बचाने के लिए , गर्भ में ही मार दी जाती हैं लड़कियाँ हर रोज़। 

अपने पाप के घड़े को इतना भी मत छलका कि बाढ़ आ जाए, 
और पैसों की भूख तेरी ही बोटी बोटी खा जाए। 

तूने अपनी सत्ता का दुरूपयोग बहुत किया है कदम कदम पे, 
भुक्तभोगी हूँ मैं तेरी तानाशाही की ,जो आज है चरम पे। 

ताश के पत्तों की तरह तेरे झूठ का महल एक दिन ढे़र हो जायेगा, 
तेरा अहंकार भी हवा में कहीं खो जायेगा। 

उम्मीद करती हूँ मेरे खून के आँसुओं का हिसाब तू ख़ुद एक दिन करेगा, 
भगवान अगर इस धरती पे है, तो वो दिन दूर नहीं, जब तू ख़ुद पश्चाताप की अग्नि में जलेगा। 

अपूर्वा तिवारी

Friday, 2 April 2021

शायद तुम यही चाहते थे

वो मेरा व्यक्तित्व है जो मैंने दर्शाया,
वो तुम्हारा अस्तित्व है जो तुमने झलकाया,
पर अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।

वो मेरा प्यार है जो आज तक कम नहीं हुआ,
वो तुम्हारा तिरस्कार है जो आज तक खत्म नहीं हुआ,
पर अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।

वो मेरे लिए आत्मा से आत्मा का मिलन था,
जो तुम्हारे लिए रस्मों रिवाज़ों का अनचाहा बंधन था,
अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।

वो हर खुशी मेरी तुम्हारे सांनिध्य से जुड़ी थी,
जो बोझ रूपी गठरी के रूप में तुम्हारे सर पे लदी थी,
पर अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।

वो मैं हर दिन तुम्हारे साथ वक़्त बिताने के बहाने खोजती थी,
जो तुम्हारे मनगढंत काम की व्यस्तता कभी खत्म नहीं होती थी,
अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।

वो मैं थी जो सच को नज़र अंदाज़ करती रही,
वो मैं थी जो हर बात के लिए खुद को बेवज़ह कोसती रही,
और अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।

वो मैं हूँ जो रखूँगी हमेशा तुम्हारी यादों को सहेज,
वो तुम हो जो चाहे तो जोड़ो चाहे तो रखो मुझसे परहेज़,
फिर भी वाकई लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।

अपूर्वा तिवारी