ओ दहेज के दानव, अब तेरी आस क्या है
सब कुछ तो सौंप चुकी तुझे अपना, अब बचा मेरे पास क्या है
तू मात्र इक पुरुष है, इसके अलावा तेरी बिसात क्या है।
मेरे तन मन का तुझे कोई मोल नहीं, उन्हें तू अपने अधिकारों की आड़ में मटिया मेट कर चुका है,
मेरे धन के लिए इतना पागल है तू, क्या वाकई तेरे अंदर का इंसान मर चुका है।
दूसरे को बर्बाद करने से पहले ज़रा अपनी बहन बेटियों के बारे में भी इक पल सोच,
तुम जैसों से बचाने के लिए , गर्भ में ही मार दी जाती हैं लड़कियाँ हर रोज़।
अपने पाप के घड़े को इतना भी मत छलका कि बाढ़ आ जाए,
और पैसों की भूख तेरी ही बोटी बोटी खा जाए।
तूने अपनी सत्ता का दुरूपयोग बहुत किया है कदम कदम पे,
भुक्तभोगी हूँ मैं तेरी तानाशाही की ,जो आज है चरम पे।
ताश के पत्तों की तरह तेरे झूठ का महल एक दिन ढे़र हो जायेगा,
तेरा अहंकार भी हवा में कहीं खो जायेगा।
उम्मीद करती हूँ मेरे खून के आँसुओं का हिसाब तू ख़ुद एक दिन करेगा,
भगवान अगर इस धरती पे है, तो वो दिन दूर नहीं, जब तू ख़ुद पश्चाताप की अग्नि में जलेगा।
अपूर्वा तिवारी
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