वो मेरा व्यक्तित्व है जो मैंने दर्शाया,
वो तुम्हारा अस्तित्व है जो तुमने झलकाया,
पर अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।
वो मेरा प्यार है जो आज तक कम नहीं हुआ,
वो तुम्हारा तिरस्कार है जो आज तक खत्म नहीं हुआ,
पर अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।
वो मेरे लिए आत्मा से आत्मा का मिलन था,
जो तुम्हारे लिए रस्मों रिवाज़ों का अनचाहा बंधन था,
अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।
वो हर खुशी मेरी तुम्हारे सांनिध्य से जुड़ी थी,
जो बोझ रूपी गठरी के रूप में तुम्हारे सर पे लदी थी,
पर अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।
वो मैं हर दिन तुम्हारे साथ वक़्त बिताने के बहाने खोजती थी,
जो तुम्हारे मनगढंत काम की व्यस्तता कभी खत्म नहीं होती थी,
अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।
वो मैं थी जो सच को नज़र अंदाज़ करती रही,
वो मैं थी जो हर बात के लिए खुद को बेवज़ह कोसती रही,
और अब लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।
वो मैं हूँ जो रखूँगी हमेशा तुम्हारी यादों को सहेज,
वो तुम हो जो चाहे तो जोड़ो चाहे तो रखो मुझसे परहेज़,
फिर भी वाकई लगता है शायद तुम ये चाहते ही थे।
अपूर्वा तिवारी
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